प्रकृति को सहजीवी मानकर जीना चाहिए: प्रो. भास्कर

प्राच्यविद्या एवं जैन संस्कृति संरक्षण संस्थान की आयोजना में राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी (वेबिनार) का आयोजन

लाडनूं (8 जून)। नगर की प्राच्यविद्या एवं जैन संस्कृति संरक्षण संस्थान के तत्वावधान में राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी (वेबिनार) का आयोजन जैन एवं बौद्ध दर्शन की अंतर्राष्ट्रीय विद्वान, राष्ट्रपति पुरस्कार से पुरस्कृत नागपुर विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. भागचंद जैन भास्कर की अध्यक्षता में किया गया। प्रो. भास्कर ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि जैन संस्कृति का एक-एक सिद्धांत पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुमूल्य है, यह सिद्धांत सर्वोपरि है। अहिंसा, अपरिग्रह, संयम, सह अस्तित्व, शाकाहार आदि महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार प्रदूषण का मुख्य कारण हिंसा है। उन्होंने कहा प्रकृति को सहजीवी मानकर जीना चाहिए। अनेक उदाहरणों के माध्यम से पर्यावरण चेतना की बात कही। 
इस अवसर पर भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद के अध्यक्ष एवं दिगम्बर जैन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बड़ौत (उ.प्र.) के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. श्रेयांश जैन ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जैन दर्शन के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के मनीषी एवं विशेषज्ञ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जो कार्य कर रहे हैं वह जैन संस्कृति को अपनाकर कर रहे हैं। हमें अपने मूलभूत सिद्धांतों को पहचानने और पर्यावरण शुद्धि की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है। आज विश्वव्यापी कोरोना महामारी संस्कृति दोहन का कारण है। लोकडाऊन के कारण स्वतः ही वायु, जल और पृथ्वी शुद्ध हो गई। गंगा का पानी निर्मल हो गया। वह इसलिए कि हमने लोकडाऊन के कारण संयमित जीवन जिया। यह अलग बात है कि यह संयमित जीवन हमने लॉकडाउन के दौरान मजबूरन जिया। 
संगोष्ठी के सारस्वत विद्वान मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के प्राकृत एवं जैनविद्या के सह-अधिष्ठाता एवं विभागाध्यक्ष, प्रो. जिनेंद्र कुमार जैन  ने कहा कि आज हम विश्वव्यापी बीमारी कोरोना से जूझ रहे हैं और जो प्रिकाॅशन डॉक्टर द्वारा दिए जा रहे हैं वह जैन संस्कृति का हिस्सा है। डॉक्टर्स का ऐसा मानना है कि यदि जैन संस्कृति को अपनाया जाए तो असाध्य रोगों से निजात मिलेगी और पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति। षट्लेश्या आदि के माध्यम से पर्यावरण शुद्धि की बात कहीं।
सारस्वत विद्वान के रूप में जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय कि दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के निदेशक प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति हम पर हावी हो रही है। प्रकृति को जीतो की भावना के कारण आज पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। वैदिक संस्कृति बहुत समृद्ध संस्कृति है। उन्होंने कहा कि वैदिक संस्कृति में वृक्षों आदि की पूजा-अर्चना की जाती है। वह भी पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अभूतपूर्व। 
मुख्य वक्ता के रूप में गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद ग्रामीण प्रबंधन विभाग के प्रो. लोकेश जैन ने कहा कि महात्मा गांधी के विचार ही नहीं अपितु उनकी जीवनचर्या पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली है। महात्मा गांधी ने भी संयमित संसाधनों की बात कही, स्व-अनुशासित होने, पर्यावरणीय व सामाजिक प्रदूषण से बचने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि सत्य अहिंसा, अचैर्य, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का पालन अस्वादव्रत के जरिए स्व पर अंकुश कर लगाता है। इच्छाओं को संयमित करना पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। 
जैन दर्शन के कुशल वक्ता राजेंद्र महावीर सनावद ने कहा कि सभी जीवो के प्रति मैत्री भाव रखना चाहिए। आज समाज में न केवल पर्यावरण शुद्धि की आवश्यकता है। अपितु मन शुद्धि, वचन शुद्धि, विचार शुद्धि आदि की भी आवश्यकता है, जिससे समाज की बुराइयों से निजात मिलेगी। जैन दर्शन का सूत्र वाक्य है परस्पर में मैत्री करें और परस्पर में एक दूसरे का उपकार करें। जिससे सामाजिक शुद्धि के साथ-साथ पर्यावरणीय शुद्धि होगी।
इस वेबिनार में प्राकृत जगत के शिखर पुरुष प्रो. प्रेम सुमन, उदयपुर, प्रो. देव कोठारी, डॉ. सुमत जैन, रेखा जैन, रीना जैन, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से डॉ. आनंद जैन, दरभंगा विश्वविद्यालय से डॉ. वीरचंद्र जैन, समन्वय वाणी पत्रिका के संपादक डॉ अखिल बंसल, जयपुर, दिशा बोध पत्रिका के संपादक चिरंजीलाल बगड़ा, कोलकाता, देवपुरी वंदना के सम्पादक राकेश जैन सोनी, डॉ शिल्पी गुप्ता, डॉ सुधा जैन, बनारस, डॉ. वीरबाला छाजेड़, उज्जैन, मयंक जैन, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़ डॉ. अरविंद जैन, प्राचार्य शासकीय विद्यालय, आवा, डॉ आदिति गौतम, जयपुर, डॉ यतींद्र जैन, जबलपुर, शशांक सिंघाई, डॉ मनीष भटनागर, डॉ बिजेंद्र प्रधान, डॉ. जे पी सिंह, डॉ ईशा चैहान, डॉ भारती कंवर, शिव शंकर बोहरा, संजीव कुमार, परवीना भाटी, अब्दुल हमीद, दीक्षांत हिंदुस्तानी सहित लगभग 100 लोग उक्त वेबीनार में सहभागिता की। संगोष्ठी का कुशल संयोजन डॉ मनीषा जैन, लाडनूं ने किया। मंगलाचरण डॉ नीतू जैन, सुजानगढ़ द्वारा किया गया।

प्रकृति को सहजीवी मानकर जीना चाहिए: प्रो. भास्कर

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