पाश्चात्य संस्कृति से भारतीय संस्कार दूषित – प्रो लोकेश

लाडनूं स्थानीय प्राच्य विद्या एवं जैन संस्कृति संरक्षण संस्थान के तत्वावधान में जिओ ऐप के माध्यम से राष्ट्रीय बेबिनार का आयोजन गुजरात विद्यापीठ, गांधीनगर गुजरात के प्रोफेसर लोकेश जैन की अध्यक्षता में किया गया। समाज और संस्कारों के लिए घातक है पाश्चात्य संस्कृति विषयक पर बोलते हुए प्रो. लोकेश जैन ने कहा कि भारतीय संस्कृति प्राचीन एवं विशिष्ट संस्कृति रही है। इस संस्कृति में पाश्चात्य विचारों के समावेश ने हमारी संस्कृति को दूषित किया है। प्रो. जैन ने भारतीय संस्कृति के विकास एवं उत्थान के लिए संस्कारों को जीवन मूल्यों के साथ जोड़ने का आह्वान किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति का कोई सानी नहीं है। आवश्यकता जताते हुए उन्होंने कहा की हमारे नौनिहालों को भारतीय संस्कृति को अपनाना होगा, तभी भारतीय संस्कृति को संरक्षित रख सक हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जैन एवं बौद्ध दर्शन के सहायक आचार्य राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त डॉ आनंद जैन ने भारत की प्राचीन संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि यह देश हमेशा अपने प्राचीन परंपराओं अपने रीति-रिवाजों, तीज त्योहारों के लिए जाना जाता है, डॉ आनंद ने कहा कि भारत की संस्कृति वैज्ञानिकता आधारित है हर एक तीज त्योहार में वैज्ञानिकता का समावेश मिलता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि भारत की संस्कृति विश्व में अनूठी व गौरवशाली संस्कृति है। इस अवसर पर बोलते हुए मुख्य वक्ता साहित्यकार डॉ वीरेंद्र भाटी मंगल ने कहा कि भारत की संस्कृति मूल्यों पर आधारित रही है जिनमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रमुख रहा है लेकिन पाश्चात्य संस्कृति अर्थ और काम पर आधारित है। भारत की संस्कृति त्याग प्रधान रही है वही पाश्चात्य भोग से प्रेरित है। भारत की संस्कृति संयुक्त परिवार को महत्व देती है , वही पाश्चात्य संस्कृति एकल रही हैं। डॉ भाटी ने पाश्चात्य संस्कृति को भारतीय समाज और संस्कारों के लिए घातक बताते हुए कहा कि आज पाश्चात्य का प्रभाव भारत की संस्कृति पर पूर्ण रूप से देखने को मिल रहा है। उन्होंने भारत सरकार की नई शिक्षा नीति की प्रशंसा करते हुए कहा कि निश्चित रूप से नई शिक्षा नीति में भारत के मूल संस्कारों को शामिल कर एक नया निर्माण इस देश का होगा। भारतीय समाज के संपादक मुख्य वक्ता आलोक खटेड़ ने भारतीय संस्कृति को देश व समाज में संस्कार निर्माण का विशिष्ट माध्यम बताया। इस अवसर पर शिक्षाविद शिवशंकर बोहरा ने भारतीय संस्कृति को उज्जवल संस्कृति बताते हुए कहा की खान पान, रहन सहन व्यवहार विचार पर हमारी पीढ़ी को विचार कर भारत की उज्जवल संस्कृति को अपनाना चाहिए। इस अवसर पर श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर के अधीक्षक पं राहुल जैन ने पाश्चात्य भोजन शैली के दुष्प्रभावों को बताया वही दर्शन विभाग दरभंगा विश्वविद्यालय बिहार के डॉ वीरचंद चंद जैन ने भारतीय प्रसारण बढ़ रही अश्लीलता का खंडन करते हुए बताया कि यह आने वाली पीढ़ी एवं हमारे संस्कारों के लिए घातक है। कार्यक्रम का शुभारंभ शिक्षिका परवीना भाटी के संगान से हुआ। कार्यक्रम का संयोजन संस्थान की निदेशक युवा विदुषी डॉ मनीषा जैन ने कुशलता के साथ करते हुए भारतीय संस्कृति व पाश्चात्य संस्कृति को तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत किया। बेबीनार में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के प्राकृत एवं जैनविद्या विभाग के प्रो जिनेंद्र जैन, डॉ सुमत जैन, डॉ सुधा जैन, वाराणसी डॉ ज्योति बाबू जैन, जैन पत्रकार महासंघ के मंत्री उदयभान जैन, अनिल जैन, जयपुर, अशोक जैन इंदौर, रीतु जैन, सागर के साथ देश के करीब 90 लोगों ने सहभागिता दर्ज करवाई।

पाश्चात्य संस्कृति से भारतीय संस्कार दूषित – प्रो लोकेश

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